सामाजिक 🙏विमर्श  *”जयंती या नई क्रांति…?”मंच सजाने से इतिहास नहीं बदलते,उमाशंकर दिवाकर प्रधान (संपादक हमर भाखा हमर गोठ, खुल्ला बात..सुघ्घर बात)

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सामाजिक 🙏विमर्श 

*”जयंती या नई क्रांति…?”*

*”उत्सव या उत्तरदायित्व…?”*

*”फूल चढ़ाने से पहले ज़ख्मों का हिसाब भी होना चाहिए,*

*समाज का हर उत्सव, समाज के हर दुख का जवाब भी होना चाहिए।”*

बेमेतरा – प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी परम पूज्य संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी के द्वितीय पुत्र, वीर बलिदानी राजा गुरु बालक दास जी की पावन जन्म जयंती के आयोजन को लेकर 12 जुलाई 2026 को बेमेतरा रेस्ट हाउस में जिला स्तरीय बैठक आयोजित हुई। वरिष्ठ पदाधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं प्रतिनिधियों ने बैठक में भाग लेकर कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की।

लेकिन अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है…

क्या समाज केवल जयंती मनाने तक सीमित रहेगा, या बाबा गुरु घासीदास जी के विचारों को धरातल पर उतारने का संकल्प भी लेगा?

*”शिक्षा या सिर्फ़ भाषण…?”*

*”किताबों से दूर होता बचपन पूछ रहा है आज,*

*भाषण बहुत हुए… अब शिक्षा का कौन बनेगा समाज?”*

क्या समाज के हर गरीब बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी समाज ले रहा है?

क्या किसी जिला स्तरीय बैठक में यह तय होता है कि इस वर्ष कितने निर्धन बच्चों को पढ़ाया जाएगा?

कितने युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जाएगी?

कितने छात्रों को नशे से बचाने के लिए अभियान चलाया जाएगा?

यदि नहीं… तो क्या केवल मंचीय भाषण ही समाज का विकास कहलाएगा?

*”अन्याय या मौन…?”*

*”जब अत्याचार पर समाज खामोश हो जाता है,*

*तब अन्याय और भी बेखौफ हो जाता है।”*

जब समाज के किसी गरीब, कमजोर या पीड़ित व्यक्ति पर अन्याय होता है…

क्या पूरा समाज एकजुट होकर उसके साथ खड़ा होता है?

या फिर कुछ दिनों बाद मामला भुला दिया जाता है?

क्या समाज के बड़े पद और सम्मान केवल समारोहों तक सीमित हैं?

या अन्याय के समय भी उनकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए?

*”सैकड़ों संगठन… फिर भी सवाल क्यों…?”*

*”यदि कारवां इतना बड़ा है,*

*तो मंज़िल आज भी इतनी दूर क्यों है?”*

समाज में अनेक संगठन हैं…

फिर भी समाज के गरीब, मजदूर, किसान, विद्यार्थी और बेरोजगार युवा अपने आपको अकेला क्यों महसूस करते हैं?

क्या सभी संगठन एक साझा सामाजिक मिशन पर काम कर रहे हैं?

या फिर समाज कई हिस्सों में बंटकर अपनी शक्ति खो रहा है?

*”संस्कार या दिखावा…?”*

*”जो बच्चे आज मंचों से सीखेंगे,*

*वही कल समाज का भविष्य लिखेंगे।”*

क्या सामाजिक आयोजनों में बच्चों और युवाओं को बाबा गुरु घासीदास जी के विचारों, सत्य, समानता, शिक्षा और नशामुक्ति का संदेश दिया जा रहा है?

या फिर कहीं आयोजन का मूल उद्देश्य पीछे छूटता जा रहा है?

क्या हर कार्यक्रम में शिक्षा, रोजगार, महिला सुरक्षा और सामाजिक जागरूकता पर भी चर्चा होनी चाहिए?

*”नशा या नई पीढ़ी का भविष्य…?”*

*”जिस घर में नशा मुस्कुराता है,वहीं भविष्य रोता नज़र आता है।”*

क्या समाज नशामुक्ति के लिए उतनी ही गंभीरता से काम कर रहा है जितनी उत्सवों के लिए करता है?

कितने गांवों में नशामुक्ति अभियान चल रहे हैं?

कितने युवाओं को रोजगार और कौशल से जोड़ने की पहल हो रही है?

*”पद या सेवा…?””कुर्सियां सम्मान नहीं देतीं,सम्मान सेवा से मिलता है।”*

समाज के प्रत्येक पदाधिकारी, प्रत्येक संगठन और प्रत्येक जिम्मेदार व्यक्ति से सवाल…

क्या समाज ने जो विश्वास आपको दिया है, उसका प्रतिफल समाज को मिल रहा है?

क्या पद केवल सम्मान के लिए है…या समाज।

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