*ऑनलाइन हाजिरी बनी, फिर समय से पहले छुट्टी? रनबोड़ प्राथमिक स्कूल की व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल*

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*ऑनलाइन हाजिरी बनी, फिर समय से पहले छुट्टी? रनबोड़ प्राथमिक स्कूल की व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल*

*नवागढ़ विकासखंड के रनबोड़ प्राथमिक स्कूल का मामला—बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा ऑनलाइन लॉगआउट की चिंता? प्रधान पाठक ने कहा*

*“जो छापना है छाप दो, हम सब देख लेंगे”*

बेमेतरा/नवागढ़ – सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए ऑनलाइन अटेंडेंस जैसी व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। लेकिन नवागढ़ विकासखंड के शासकीय प्राथमिक पाठशाला रनबोड़ से सामने आए घटनाक्रम ने अब इस व्यवस्था की जमीनी निगरानी पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामला सिर्फ ऑनलाइन हाजिरी लगाने या लॉगआउट करने तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या ऑनलाइन अटेंडेंस दर्ज होने के बाद विद्यार्थियों को निर्धारित समय से पहले स्कूल से छुट्टी दी गई? अगर ऐसा हुआ, तो इसकी अनुमति किस स्तर से मिली और बच्चों की पढ़ाई के निर्धारित समय की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

ऑनलाइन हाजिरी पूरी, लेकिन क्या पढ़ाई भी पूरी हुई?

ऑनलाइन अटेंडेंस व्यवस्था का उद्देश्य शिक्षकों की उपस्थिति को पारदर्शी बनाना और स्कूलों की कार्यप्रणाली पर प्रभावी निगरानी रखना है। लेकिन यदि पोर्टल पर उपस्थिति और लॉगआउट का रिकॉर्ड दर्ज हो जाए और दूसरी ओर बच्चों की कक्षाएं निर्धारित समय से पहले समाप्त हो जाएं, तो व्यवस्था की वास्तविक उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

रनबोड़ प्राथमिक स्कूल के मामले में अब यह जांच का विषय है कि संबंधित शिक्षक स्कूल में किस समय पहुंचे, कितने समय तक शिक्षण कार्य कराया गया और विद्यार्थियों को वास्तविक रूप से किस समय छुट्टी दी गई।

बच्चों की छुट्टी समय से पहले हुई तो किसके आदेश पर?

अगर विद्यालय में निर्धारित समय से पहले विद्यार्थियों को घर भेजा गया, तो सवाल यह भी है कि क्या इसकी कोई विभागीय अनुमति थी? क्या अभिभावकों को इसकी जानकारी दी गई थी? और क्या स्कूल प्रबंधन ने इसकी सूचना उच्च अधिकारियों को दी?

ग्रामीण क्षेत्र के अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर स्कूल और शिक्षकों पर भरोसा करते हैं। ऐसे में यदि निर्धारित शिक्षण समय में कटौती की जाती है, तो इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ सकता है।

*पत्रकारों के सवाल पर प्रधान पाठक का दो टूक जवाब*

मामले की जानकारी सामने आने के बाद जब पत्रकारों ने विद्यालय पहुंचकर वस्तुस्थिति जानने और स्कूल प्रबंधन का पक्ष लेने का प्रयास किया, तो बताया गया कि प्रधान पाठक ने पत्रकारों के समक्ष अपना पक्ष रखने से इनकार कर दिया।इस दौरान उनके द्वारा कथित रूप से यह बात कही गई—

*“जो छापना है छाप दो, हम सब देख लेंगे।”*

*अब यही कथन पूरे मामले में एक अलग सवाल खड़ा कर रहा है।*

पत्रकारों का काम किसी संस्था को बदनाम करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े सवालों को सामने लाना है। ऐसे में यदि स्कूल की व्यवस्था पूरी तरह नियमों के अनुरूप थी, तो सवालों का जवाब देने के बजाय इस तरह की प्रतिक्रिया क्यों सामने आई?

*अब निगाह शिक्षा विभाग की जांच पर*

मामला सामने आने के बाद सबसे अहम जिम्मेदारी शिक्षा विभाग की है। क्या विभाग केवल ऑनलाइन अटेंडेंस का रिकॉर्ड देखकर संतुष्ट होगा या फिर स्कूल में वास्तविक शिक्षण अवधि की भी जांच करेगा?

*जांच में यह देखा जाना जरूरी है कि—*

ऑनलाइन अटेंडेंस किस समय दर्ज हुई?

संबंधित शिक्षकों का लॉगआउट किस समय हुआ?

विद्यालय में वास्तविक शिक्षण कार्य कितने समय तक चला?

विद्यार्थियों को किस समय स्कूल से रवाना किया गया?

क्या निर्धारित समय से पहले छुट्टी देने की कोई अनुमति थी?

क्या स्कूल में नियमित रूप से औचक निरीक्षण किया जाता है?

क्या शिक्षक शासन के निर्देशों के अनुरूप विद्यालय और मुख्यालय संबंधी नियमों का पालन कर रहे हैं?

*डीईओ और बीईओ के सामने कई सवाल*

रनबोड़ स्कूल के मामले में अब बेमेतरा जिला शिक्षा अधिकारी और नवागढ़ ब्लॉक शिक्षा अधिकारी से उम्मीद है कि वे पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराएंगे।

सिर्फ कागजों और ऑनलाइन पोर्टल में दर्ज उपस्थिति से स्कूल की व्यवस्था सही साबित नहीं हो सकती। ऑनलाइन हाजिरी के साथ बच्चों की वास्तविक पढ़ाई, कक्षा संचालन और विद्यालय में शिक्षकों की मौजूदगी का भी सत्यापन जरूरी है।

*शासन की मंशा बनाम जमीनी हकीकत*

सरकार शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने, बच्चों की नियमित उपस्थिति बढ़ाने और शिक्षकों की जवाबदेही तय करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। ऐसे में यदि किसी सरकारी स्कूल में निर्धारित शिक्षण समय को लेकर सवाल खड़े होते हैं, तो इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

क्योंकि सवाल सिर्फ एक स्कूल का नहीं है।

सवाल उन बच्चों के भविष्य का है, जो सरकारी स्कूल में पढ़कर अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैं।

*अब फैसला जांच से होगा*

रनबोड़ प्राथमिक स्कूल में वास्तव में क्या हुआ, इसका अंतिम सच विभागीय जांच और रिकॉर्ड के मिलान से ही सामने आएगा। लेकिन फिलहाल सवाल साफ है—

क्या ऑनलाइन हाजिरी दर्ज होना ही पर्याप्त है, या यह भी देखना होगा कि उस उपस्थिति के दौरान बच्चों को वास्तव में कितनी पढ़ाई मिली?

क्या शिक्षा विभाग ऑनलाइन अटेंडेंस और लॉगआउट रिकॉर्ड के साथ विद्यार्थियों की छुट्टी के समय का भी मिलान करेगा?

क्या स्कूल प्रबंधन से पूरे घटनाक्रम पर जवाब मांगा जाएगा?

और यदि जांच में नियमों का उल्लंघन सामने आता है, तो क्या जिम्मेदारी तय करते हुए कार्रवाई की जाएगी?

अब नजर नवागढ़ शिक्षा विभाग और जिला शिक्षा विभाग की अगली कार्रवाई पर है।

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