*जातिवाद की जंजीरों में जकड़ा लोकतंत्र? अनुसूचित जाति के युवा सरपंच की जीत से क्यों बौखलाई व्यवस्था?…* ¤
*क्या संविधान हार रहा है और जातिवाद जीत रहा है?
*क्या आज भी गांवों में सरपंच की कुर्सी जाति देखकर तय होती है?
*क्या कानून के रक्षक ही यदि जाति पूछकर न्याय बांटने लगें तो पीड़ित आखिर जाए कहां?*
*क्या बेमेतरा में लोकतंत्र पर जातिवाद का ग्रहण लग चुका है?*
विशेष रिपोर्ट | न्यूज़ स्टोरी दृष्टि छत्तीसगढ़ के बेमेतरा विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत भिभौरी तहसील के ग्राम पंचायत खंगारपाठ के आश्रित ग्राम बोहारडीह में नव निर्वाचित युवा सरपंच अशोक बघेल से जुड़े घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरपंच और ग्रामीणों का आरोप है कि अनुसूचित जाति समाज के लोगों को जातिगत द्वेष के कारण पंचायत के ही नरेंद्र वर्मा, मानसिंह वर्मा, विकास कश्यप द्वारा जाति द्वेष के कारण प्रताड़ित किया गया, महिलाओं एवं पुरुषों के साथ मारपीट की गई तथा जान से मारने की धमकियां देकर गांव में भय और अशांति का माहौल बनाया गया्।
ग्रामीणों का आरोप है कि जब पीड़ित पक्ष शिकायत लेकर कंडरका चौकी पहुंचा तो आरोपियों के विरुद्ध अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कार्रवाई करने के बजाय सामान्य धाराओं में मामला दर्ज कर आरोपियों को बचाने का प्रयास किया गया।
सवालों के घेरे में पुलिस व्यवस्था
यदि आरोप सही हैं तो सवाल उठता है कि—
– क्या शिकायतकर्ता की जाति देखकर कानून की धाराएं तय की जा रही हैं?
– क्या संविधान की शपथ लेने वाले अधिकारी जातीय पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं हैं?
– क्या अनुसूचित जाति के लोगों की शिकायतों को आज भी हल्के में लिया जाता है?
– यदि जातिगत प्रताड़ना के आरोप थे तो संबंधित विशेष कानूनों के तहत कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
– क्या पुलिस की निष्पक्षता पर उठ रहे सवालों का जवाब कोई देगा?
सरपंच बनने की सजा या सामाजिक बदलाव का विरोध?
ग्रामीणों का कहना है कि आजादी के बाद पहली बार इस समाज का व्यक्ति गांव का सरपंच बना है।
तो क्या एक अनुसूचित जाति का युवा नेतृत्व करे, यही कुछ लोगों को स्वीकार नहीं?
क्या लोकतांत्रिक जनादेश को दबंगई से कुचलने की कोशिश हो रही है?
क्या गांव के विकास से ज्यादा कुछ लोगों को जातिगत वर्चस्व की चिंता है?
प्रदेश की राजनीति से भी बड़ा सवाल
जब किसी गांव में महिलाओं के साथ मारपीट, जातिगत अपमान और भय का वातावरण बनने के आरोप लग रहे हों तो—
– सत्ता पक्ष चुप क्यों है?
– विपक्ष की आवाज कहां है?
– सामाजिक न्याय की बातें करने वाले नेता मौन क्यों हैं?
– क्या दलित समाज के सम्मान का मुद्दा केवल चुनावी मंचों तक सीमित है?
– क्या सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी केवल कार्यक्रमों तक सीमित रह गई है
मानवता हार रही है या समाज जागेगा?
21वीं सदी के भारत में यदि किसी व्यक्ति को उसकी जाति के कारण अपमानित किया जाता है, धमकाया जाता है और न्याय पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, तो यह केवल एक गांव की घटना नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए चिंतन का विषय है।
जातिवाद केवल संविधान का अपमान नहीं, बल्कि मानवता पर कलंक है।
जो लोग जाति के नाम पर नफरत, हिंसा और भेदभाव को बढ़ावा देते हैं, क्या वे वास्तव में सभ्य समाज का हिस्सा कहलाने योग्य हैं?
क्या इंसान को इंसान समझने में भी अब जाति का प्रमाणपत्र लगेगा?
सैकड़ों ग्रामीण पहुंचे न्याय की गुहार लेकर
बोहारडीह एवं खंगारपाठ के सैकड़ों ग्रामीणों ने नव निर्वाचित सरपंच अशोक बघेल के समर्थन में उच्च अधिकारियों से मुलाकात कर निष्पक्ष जांच और कठोर कार्रवाई की मांग की है।
सरपंच अशोक बघेल ने पुलिस उप महानिरीक्षक एवं पुलिस अधीक्षक रामकृष्ण साहू से मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग की है। साथ ही सतनामी समाज के ब्लॉक, जिला एवं प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों से भी इस मामले में हस्तक्षेप कर न्याय दिलाने की अपील की गई है।
अब निगाहें प्रशासन पर
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
– क्या बेमेतरा पुलिस निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाएगी?
– क्या आरोपित व्यक्तियों पर कठोर कार्रवाई होगी?
– क्या पुलिस की भूमिका की भी जांच होगी?
– क्या दलित समाज का भरोसा व्यवस्था पर कायम रह पाएगा?
– यदि उचित कार्रवाई नहीं हुई तो आगे समाज का रुख क्या होगा?
इन सवालों के जवाब आने वाला समय देगा, लेकिन फिलहाल एक बात साफ है कि बेमेतरा के बोहारडीह और खंगारपाठ से उठी यह आवाज अब केवल एक गांव की आवाज नहीं रही, बल्कि सामाजिक न्याय, संवैधानिक अधिकार और मानवीय गरिमा की बड़ी बहस बन चुकी है।
न्यूज़ स्टोरी दृष्टि का सवाल
आखिर कब खत्म होगा जातिवाद का यह जहर?
कब तक संविधान की किताब और जमीन की हकीकत अलग-अलग दिखाई देती रहेगी?
कब तक दलित समाज सम्मान, 
सुरक्षा और न्याय के लिए संघर्ष करता रहेगा?
और आखिर कब साबित होगा कि भारत में इंसान की पहचान उसकी जाति नहीं, उसकी नागरिकता और मानवता है?









