*जातिवाद की जंजीरों में जकड़ा लोकतंत्र? नव-निर्वाचित दलित सरपंच की पीड़ा ने उठाए गंभीर सवाल…?*
विशेष रिपोर्ट | न्यूज़ स्टोरी दृष्टि –
क्या आज भी गांवों में लोकतंत्र जाति के तराजू पर तौला जा रहा है?
क्या संविधान द्वारा दिए गए समान अधिकार सिर्फ किताबों तक सीमित हैं?
क्या अनुसूचित जाति का कोई युवा जब नेतृत्व की कुर्सी तक पहुंचता है, तो उसे व्यवस्था का सहयोग मिलता है या प्रताड़ना? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि एक गांव के नव-निर्वाचित अनुसूचित जाति युवा सरपंच कमल बघेल का आरोप है कि सरपंच बनने के बाद से ही उन्हें लगातार जातिगत प्रताड़ना और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
सरपंच के समर्थन में उमड़ा जनसैलाब मामला इतना गंभीर बताया जा रहा है कि सैकड़ों ग्रामीण सरपंच कमल बघेल के समर्थन में पुलिस महानिरीक्षक व पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय पहुंचे और पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच तथा दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए जनप्रतिनिधि को ही सुरक्षा और सम्मान नहीं मिलेगा, तो आम जनता का व्यवस्था पर विश्वास कैसे कायम रहेगा.?दबंगई या लोकतंत्र की हत्या?
आरोपों के केंद्र में एक स्थानीय राजनीतिक नेता और उनके समर्थकों का नाम सामने आ रहा है।
*सवाल यह भी है*
क्या जनप्रतिनिधि बनने का अधिकार सिर्फ कुछ खास वर्गों तक सीमित है?
क्या अनुसूचित जाति का व्यक्ति नेतृत्व करे, यह कुछ लोगों को स्वीकार नहीं?आखिर ऐसी कौन-सी ताकतें हैं जो लोकतांत्रिक जनादेश को चुनौती देने का प्रयास कर रही हैं?क्या राजनीतिक प्रभाव और दबंगई कानून से भी ऊपर हो गई है? पुलिस की भूमिका पर भी उठे सवाल मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी कई प्रश्न खड़े हो रहे हैं। ग्रामीणों और पीड़ित पक्ष का आरोप है कि शिकायतों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
*अब सवाल यह है*
क्या शिकायतों की निष्पक्ष जांच की गई?क्या पीड़ित की बात को गंभीरता से सुना गया?यदि जातिगत प्रताड़ना के आरोप हैं, तो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई क्यों नहीं हुई?क्या कहीं न कहीं सिस्टम का रवैया पीड़ित के प्रति संवेदनहीन दिखाई दे रहा है?थाना प्रभारी पर उठते सवाल क्षेत्र में चर्चा का विषय थाना प्रभारी की भूमिका भी बनी हुई है।
*जनता पूछ रही है*
आखिर बार-बार इसी थाने में पदस्थापना या वापसी के पीछे क्या कारण हैं? क्या यह महज प्रशासनिक प्रक्रिया है या इसके पीछे कोई और कहानी छिपी है?क्या निष्पक्षता पर उठ रहे सवालों का जवाब प्रशासन देगा? क्या विभाग इस पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराएगा?हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना बाकी है। संविधान बनाम सामाजिक मानसिकता देश को आजाद हुए लगभग आठ दशक बीत चुके हैं। संविधान ने हर नागरिक को समान अधिकार दिए हैं, लेकिन यदि आज भी किसी व्यक्ति को उसकी जाति के कारण अपमान, विरोध या प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है, तो यह केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे समाज और व्यवस्था का प्रश्न बन जाता है।
*सबसे बड़ा सवाल*
जब एक निर्वाचित सरपंच स्वयं न्याय और सम्मान के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हो, तब आम नागरिक किस पर भरोसा करे?क्या प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाएगा?क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी?या फिर यह मामला भी फाइलों और औपचारिकताओं में दबकर रह जाएगा? फिलहाल पूरे क्षेत्र की निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। जनता जवाब चाहती है, और लोकतंत्र भी।
न्यूज़ स्टोरी दृष्टि पूछता है — क्या संविधान का सम्मान सिर्फ भाषणों तक सीमित रहेगा, या ज़मीन पर भी न्याय दिखाई देगा?









